March 4, 2026

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Holashtak 2025 : होलाष्टक आज से आरंभ, क्यों इन 8 दिन क्रूर हो जाते हैं ग्रह, जानें क्या करें क्या न करें

होली से आठ दिन पहले से होलाष्टक लग जाता है। होलाष्टक के दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। होलाष्टक को ज्योतिष शास्त्र में अशुभ माना जाता है। मान्यता के अनुसार, होलाष्टक के दौरान सभी ग्रह क्रूर अवस्था में होते हैं। इसलिए किसी भी शुभ कार्य की मनाही होती है। इस बार होलाष्टक 7 मार्च 2025 शुक्रवार से लगने जा रहे हैं। आइए जानते हैं होलाष्टक को क्यों अशुभ माना जाता है और इस दौरान कौन से ग्रह क्रूर हो जाते हैं। आइए जानते हैं होलाष्टक ज्योतिषीय मान्यता है और पौराणिक कथा। साथ ही जानें होलाष्टक के दौरान क्या करना चाहिए और क्या नहीं।

होलाष्टक 2025 कब से कब तक?
होलाष्टक 7 मार्च से शुरू होगा और 13 मार्च को होलिका दहन के साथ समाप्त होगा। इससे अगले दिन यानी 14 मार्च को रंग वाली होली मनाई जाएगी। होलाष्टक के आठ दिन अलग अलग ग्रह क्रूर अवस्था में रहते हैं। अष्टमी तिथि के दिन चंद्रमा, नवमी तिथि के दिन सूर्य देव, दशमी तिथि के दिन शनि महाराज, एकादशी तिथि के दिन शुक्र देव, द्वादशी तिथि के दिन देवगुरु बृहस्पति, त्रयोदशी तिथि के दिन बुध, चतुर्दशी तिथि पर मंगल और पूर्णिमा पर राहु क्रूर हो जाते हैं। इन 8 दिनों में कोई भी नई वस्तु की खरीदारी भी नहीं की जाती है।

होलाष्टक में क्या करना चाहिए और क्या नहीं ?
होलाष्टक में ग्रहों के अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए पूजा पाठ अधिक से अधिक करना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि होलाष्टक के दौरान भगवान विष्णु, नरसिंह भगवान और हनुमानजी की विशेष पूजा अर्चना करनी चाहिए। इसके अलावा इन आठों दिनों तक महामृत्युंजय मंत्र का जप भी करना चाहिए। साथ ही होलाष्टक के दौरान शादी, मुंडन, ग्रह प्रवेश जैसे शुभ कार्यों को नहीं करना चाहिए। इस दौरान कोई भी दुकान, प्लॉट आदि संपत्ति की खरीदारी नहीं करनी चाहिए।

होलाष्टक को क्यों मानते हैं अशुभ
होलाष्टक को लेकर शिव पुराण में कथा वर्णित की गई है। कथा के अनुसार, तारकासुर का वध करने के लिए भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह होने जरुरी थी। क्योंकि, उस असुर का वध शिव पुत्र के हाथ से होना था। लेकिन, देवी सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव तपस्या में लीन थे। सभी देवताओं ने भगवान शिव को तपस्या से जगाना चाहा। इस काम के लिए भगवान शिव और देवी रति को बुलाया गया। इसके बाद कामदेव और रति ने शिवजी की तपस्या को भंग कर दिया और भगवान शिव क्रोधित हो गए। शिवजी ने अपने तीसरे नेत्र से कामदेव को भस्म कर दिया। जिस दिन भगवान शिव से कामदेव को भस्म किया उस दिन फाल्गुन शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि थी। इसके बाद सभी देवताओं ने रति के साथ मिलकर भगवान शिव से क्षमा मांगी। भगवान शिव को मनाने में सभी को आठ दिन का समय लग गया। इसके बाद भगवान शिव ने कामदेव को जीवित होने का आशीर्वाद दिया। इस वजह से इन आठ दिनों को अशुभ माना जाता है।

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